रांची
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखंड की प्राचीन मेगालीथ संरचनाओं को मानव सभ्यता की अमूल्य स्मृति बताते हुए उनके संरक्षण और वैश्विक पहचान पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि झारखंड की धरती पर खड़े ये मेगालीथ केवल पत्थर नहीं, बल्कि मानव इतिहास और संस्कृति के साक्ष्य हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जैसे विश्व के अन्य मेगालिथ और मोनोलिथ संरचनाएं सांस्कृतिक विरासत की पहचान हैं, वैसे ही झारखंड के मेगालीथ भी राज्य और देश की ऐतिहासिक धरोहर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उचित संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने के लिए राज्य सरकार हर संभव प्रयास करेगी।
हेमंत सोरेन ने यह भी कहा कि इन प्राचीन संरचनाओं को UNESCO विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की दिशा में सरकार गंभीरता से काम करेगी। उन्होंने इसे न केवल झारखंड या भारत, बल्कि पूरी दुनिया की साझा धरोहर बताया।

बता दें कि सीएम सोरेन का आगामी दावोस और यूनाइटेड किंगडम यात्रा का उद्देश्य केवल झारखंड की औद्योगिक क्षमता और शिक्षा के विकास को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि राज्य की प्राचीन मेगालीथिक विरासत को भी अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना है। झारखंड की कंदराओं, जंगलों और गांवों में हजारों वर्षों से मौजूद वृहत् पाषाण आज भी जीवंत सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार सिंहभूम क्षेत्र वह भू-भाग है, जो पृथ्वी पर सबसे पहले समुद्र से ऊपर उठा था। यहां पंक्तिबद्ध मेगालीथ सूर्य की गति, दिन-रात की अवधि और खगोलीय गणनाओं से जुड़े हुए हैं। वहीं गुफाओं में मौजूद भित्ति चित्र, जीवाश्मयुक्त वन प्रांतर और शैल चित्र एक ऐसे दुर्लभ भू-दृश्य का निर्माण करते हैं, जहां प्रागैतिहासिक काल और वर्तमान मानव संस्कृति साथ-साथ विद्यमान हैं।
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